सुनो द्रोणाचार्य
सुनो
अब लदने को हैं
दिन तुम्हारे
छल के
बल के
छल बल के
लंगड़ा ही सही
लोकतंत्रा आ गया है अब
जिसमें एकलव्यों के लिए भी
पर्याप्त ‘स्पेस’ होगा
मिल सकेगा अब जैसा को तैसा
अंगूठा के बदले अंगूठा
और
हनुमानकूद लगाना लगवाना अर्जुनों का
न कदापि अब आसान होगा
तब के दैव राज में
पाखंडी लंगड़ा था न्याय तुम्हारा
जो बेशक तुम्हारे राग दरबारी से उपजा होगा
था छल स्वार्थ सना तुम्हरा गुरु धर्म
पर अब गया लद दिनदहाड़े हकमारी का
वो पुरा ख्याल वो पुरा जमाना
अब के लोकतंत्रा में तर्कयुग में
उघड़ रहा है तेरा
छलत्कारों हत्कर्मों हरमजदगियों का
वो कच्चा चिट्ठा
जो साफ शफ्फाफ बेदाग बनकर
अब तक अक्षुण्ण खड़ा था
तुम्हारे द्वारा सताए गयों के
अधिकार अचेतन होने की बावत
डरो चेतो या कुछ करो द्रोण
कि बाबा साहेब के सूत्रा संदेश-
पढ़ो संगठित बनो संघर्ष करो
की अधिकार पट्टी पढ़ गुन कर
तुम्हारे सामने
इनक्लाबी प्रत्याक्रमण युयुत्सु
भीमकाय जत्था खड़ा है ।
2007
सुनो द्रोणाचार्य - मुसाफिर बैठा
1:22 am
गंगा सहाय मीणा
बुद्ध फिर मुस्कुराए - मुसाफिर बैठा
1:21 am
गंगा सहाय मीणा
अपने जीवनकाल में किसी सामाजिक प्रसंग पर
कभी मुस्कुराए भी थे बुद्ध
यह आमद प्रश्न इतिहास सच के करीब कम
कल्पना सृजित ज्यादा है
यदि कभी मुस्कुराए होंगे बुद्ध
तो इस बात पर भी जरूर
कि धन वैभव राग विलास जैसा भंगुर सुख भी
हमारी जरा मृत्यु की अनिवार गति को
नहीं सकता लांघ
और इसी निकष पर पहुंच
इस महामानव ने किया होगा
इतिहास प्रसिद्ध महाभिनिष्क्रमण
बुद्ध फिर मुस्कुराए-
अव्वल तो यह कथन ही मिथ्या लगता है
बुद्ध की हेठी करता दिखता है यह
अबके समय में
मनुष्य जन्म की बारंबारता को
इंगित करता है यह कथन
जबकि एक ही नश्वर जीवन के
यकीनी थे बुद्ध
अहिंसक अईश्वरीय जीवन के
पुरजोर हिमायती थे वे
अगर होते तो
अपने विचारों के प्रति
जग के नकार भाव पर ही
सबसे पहले मुस्कुराते बुद्ध
पोखरन के परमाणु विस्फोट पर
बुद्ध के मुस्कुराने का
बिम्ब गढ़नेवालों की सयानी राजबुद्धि पर भी
कम नहीं मुस्कुराते बुद्ध
बामियान की बुद्धमूर्ति श्ाृंखला को
हत आहत करनेवाली शासकबुद्धि की
शुतुरमुर्ग भयातुरता पर भी जरूर
मुस्कुराए बिना नहीं रह पाते बुद्ध
और तो और
होते अगर अभी बुद्ध
तो देखने वाली बात यह होती
कि अपने नाम पर पलने वाले
तमाम अबौद्ध विचार धर्म को देख ही कदाचित
सबसे अधिक मुस्कुरा रहे होते बुद्ध ।
बुद्धजयंती 2008
कभी मुस्कुराए भी थे बुद्ध
यह आमद प्रश्न इतिहास सच के करीब कम
कल्पना सृजित ज्यादा है
यदि कभी मुस्कुराए होंगे बुद्ध
तो इस बात पर भी जरूर
कि धन वैभव राग विलास जैसा भंगुर सुख भी
हमारी जरा मृत्यु की अनिवार गति को
नहीं सकता लांघ
और इसी निकष पर पहुंच
इस महामानव ने किया होगा
इतिहास प्रसिद्ध महाभिनिष्क्रमण
बुद्ध फिर मुस्कुराए-
अव्वल तो यह कथन ही मिथ्या लगता है
बुद्ध की हेठी करता दिखता है यह
अबके समय में
मनुष्य जन्म की बारंबारता को
इंगित करता है यह कथन
जबकि एक ही नश्वर जीवन के
यकीनी थे बुद्ध
अहिंसक अईश्वरीय जीवन के
पुरजोर हिमायती थे वे
अगर होते तो
अपने विचारों के प्रति
जग के नकार भाव पर ही
सबसे पहले मुस्कुराते बुद्ध
पोखरन के परमाणु विस्फोट पर
बुद्ध के मुस्कुराने का
बिम्ब गढ़नेवालों की सयानी राजबुद्धि पर भी
कम नहीं मुस्कुराते बुद्ध
बामियान की बुद्धमूर्ति श्ाृंखला को
हत आहत करनेवाली शासकबुद्धि की
शुतुरमुर्ग भयातुरता पर भी जरूर
मुस्कुराए बिना नहीं रह पाते बुद्ध
और तो और
होते अगर अभी बुद्ध
तो देखने वाली बात यह होती
कि अपने नाम पर पलने वाले
तमाम अबौद्ध विचार धर्म को देख ही कदाचित
सबसे अधिक मुस्कुरा रहे होते बुद्ध ।
बुद्धजयंती 2008
मैं उनके मंदिर गया था - मुसाफिर बैठा
1:19 am
गंगा सहाय मीणा
उस दिन
मैं उनके मंदिर गया था
चाहा था अपने ईश की पूजा-अभ्यर्थना करना
मंदिर द्वार पर ही मुझे धो दिया उन्होंने
लत्तम-जुत्तम कर अधमरा कर दिया
मेरी धुलाई का प्रसंग स्पष्ट किया-
चूहड़े चमार कहीं के
गंदे नाली के कीड़े
गांधी ने हरिजन क्या कह दिया
दौड़े चले आये हमारी देवी मॉं के यहॉं
अपनी गंदगी फैलाने
किसी के कह देने भर से
लगे हमारी तरह के हरिजन बनने का स्वप्न देखने
मुझे क्या था मालूम
कि हरि पर तो कुछेक प्रभुजनों का ही अधिकार है
और इस देवी मंदिर को
ऐसे ही प्रभुजनों ने
अपनी खातिर सुरक्षित कर कब्जा रखा था
मेरे अंतर्मन में ईश्वर के बौनेपन का साक्षात्कार किया
और आप-ही-आप सवाल किया
फ्लैश बैक में कुछ टोहने टटोलने लगा
विद्या की देवी सरस्वती
धन की लक्ष्मी
हमारे तैंतीस करोड़ देव-देवियों का हुजूम
अब सौ करोड़ भारतीयों में एक देव के हिस्से
अमूमन तीन आदमी का सुरक्षा दायित्व
बल्कि विधर्मियों, ईश-उदासीनों की संख्या
को घटाकर और भी कम लोगों का
फिर भी हम रहे सदियों
विद्या वंचित अकिंचन धनहीन
क्योंकर पाता कोई हमारा
हक, हिस्सा और स्वत्व ले छीन
क्या यह एक सवाल हो सकता है
कि औरों से मुंह फेरे जो ईश्वर
समाज-सत्ता संचालकों के घर जा बैठता है
ईश्वर उनका ही परिकल्पित-मनोकामित
उनके ही गुणसूत्रों का धारक
कोई अनगढ़ अन्यमनस्क पैदावार तो नहीं
हमीं में से जो लोग
ईश्वर की सत्ता शक्ति लौट आने के इंतजार में हैं
इंतजार की अनगिन घड़िया गिनते रहें
फिर जाएं मंदिर
पाते रहें प्रसाद ईश-प्रीत के
मैं तो अब महसूस गया हूं
कि दरहकीकत यह कमबख्त ईश्वरीय सत्ता ही
प्रभुवर्ग की प्रभुता का सबब है
और हमारी अशक्यता, हमारे पराभव का कारक भी
अब हमें किसी गैरदुनियावी, अलौकिक
शक्ति सहायता की दरकार नहीं
किसी का इंतजार नहीं करना
अपने बाजुओं का ही अहरह भरोसा है
मैं उनके मंदिर गया था
चाहा था अपने ईश की पूजा-अभ्यर्थना करना
मंदिर द्वार पर ही मुझे धो दिया उन्होंने
लत्तम-जुत्तम कर अधमरा कर दिया
मेरी धुलाई का प्रसंग स्पष्ट किया-
चूहड़े चमार कहीं के
गंदे नाली के कीड़े
गांधी ने हरिजन क्या कह दिया
दौड़े चले आये हमारी देवी मॉं के यहॉं
अपनी गंदगी फैलाने
किसी के कह देने भर से
लगे हमारी तरह के हरिजन बनने का स्वप्न देखने
मुझे क्या था मालूम
कि हरि पर तो कुछेक प्रभुजनों का ही अधिकार है
और इस देवी मंदिर को
ऐसे ही प्रभुजनों ने
अपनी खातिर सुरक्षित कर कब्जा रखा था
मेरे अंतर्मन में ईश्वर के बौनेपन का साक्षात्कार किया
और आप-ही-आप सवाल किया
फ्लैश बैक में कुछ टोहने टटोलने लगा
विद्या की देवी सरस्वती
धन की लक्ष्मी
हमारे तैंतीस करोड़ देव-देवियों का हुजूम
अब सौ करोड़ भारतीयों में एक देव के हिस्से
अमूमन तीन आदमी का सुरक्षा दायित्व
बल्कि विधर्मियों, ईश-उदासीनों की संख्या
को घटाकर और भी कम लोगों का
फिर भी हम रहे सदियों
विद्या वंचित अकिंचन धनहीन
क्योंकर पाता कोई हमारा
हक, हिस्सा और स्वत्व ले छीन
क्या यह एक सवाल हो सकता है
कि औरों से मुंह फेरे जो ईश्वर
समाज-सत्ता संचालकों के घर जा बैठता है
ईश्वर उनका ही परिकल्पित-मनोकामित
उनके ही गुणसूत्रों का धारक
कोई अनगढ़ अन्यमनस्क पैदावार तो नहीं
हमीं में से जो लोग
ईश्वर की सत्ता शक्ति लौट आने के इंतजार में हैं
इंतजार की अनगिन घड़िया गिनते रहें
फिर जाएं मंदिर
पाते रहें प्रसाद ईश-प्रीत के
मैं तो अब महसूस गया हूं
कि दरहकीकत यह कमबख्त ईश्वरीय सत्ता ही
प्रभुवर्ग की प्रभुता का सबब है
और हमारी अशक्यता, हमारे पराभव का कारक भी
अब हमें किसी गैरदुनियावी, अलौकिक
शक्ति सहायता की दरकार नहीं
किसी का इंतजार नहीं करना
अपने बाजुओं का ही अहरह भरोसा है
सदियों का संताप - ओमप्रकाश वाल्मीकि
1:12 am
गंगा सहाय मीणा
दोस्तों,
बिता दिए हमने हजारों वर्ष
इस इंतजार में
कि भयानक त्रासदी का युग
अधबनी इमारत के मलबे में
दबा दिया जाएगा किसी दिन
जहरीले पंजों समेत.
फिर हम सब
एक जगह खडे होकर
हथेलियों पर उतार सकेंगे
एक-एक सूर्य
जो हमारी रक्त शिराओं में
हजारों परमाणु क्षमताओं की ऊर्जा
समाहित करके
धरती को अभिशाप से मुक्त कराएगा!
इसीलिए, हमने अपनी समूची घृणा को
पारदर्शी पत्तों में लपेटकर
ठूंठे वृक्ष की नंगी टहनियों पर
टांग दिया है
ताकि आने वाले समय में
ताजे लहू से महकती सडकों पर
नंगे पांव दौडते
सख्त चेहरों वाले सांवले बच्चे
देख सकें
कर सकें प्यार
दुश्मनों के बच्चों में
अतीत की गहनतम पीडा को भूलकर
हमने अपनी उंगलियों के किनारों पर
दुःस्वप्न की आंच को
असंख्य बार सहा है
ताजा चुभी फांस की तरह
और अपने ही घरों में
संकीर्ण पतली गलियों में
कुनमुनाती गंदगी से
टखनों तक सने पांव में
सुना है
दहाडती आवाजों को
किसी चीख की मानिंद
जो हमारे हृदय से
मस्तिष्क तक का सफर तय करने में
थक कर सो गई है.
दोस्तों,
इस चीख को जगाकर पूछो
कि अभी और कितने दिन
इसी तरह गुमसुम रहकर
सदियों का संताप सहना है
!
(जनवरी, 1989)
बिता दिए हमने हजारों वर्ष
इस इंतजार में
कि भयानक त्रासदी का युग
अधबनी इमारत के मलबे में
दबा दिया जाएगा किसी दिन
जहरीले पंजों समेत.
फिर हम सब
एक जगह खडे होकर
हथेलियों पर उतार सकेंगे
एक-एक सूर्य
जो हमारी रक्त शिराओं में
हजारों परमाणु क्षमताओं की ऊर्जा
समाहित करके
धरती को अभिशाप से मुक्त कराएगा!
इसीलिए, हमने अपनी समूची घृणा को
पारदर्शी पत्तों में लपेटकर
ठूंठे वृक्ष की नंगी टहनियों पर
टांग दिया है
ताकि आने वाले समय में
ताजे लहू से महकती सडकों पर
नंगे पांव दौडते
सख्त चेहरों वाले सांवले बच्चे
देख सकें
कर सकें प्यार
दुश्मनों के बच्चों में
अतीत की गहनतम पीडा को भूलकर
हमने अपनी उंगलियों के किनारों पर
दुःस्वप्न की आंच को
असंख्य बार सहा है
ताजा चुभी फांस की तरह
और अपने ही घरों में
संकीर्ण पतली गलियों में
कुनमुनाती गंदगी से
टखनों तक सने पांव में
सुना है
दहाडती आवाजों को
किसी चीख की मानिंद
जो हमारे हृदय से
मस्तिष्क तक का सफर तय करने में
थक कर सो गई है.
दोस्तों,
इस चीख को जगाकर पूछो
कि अभी और कितने दिन
इसी तरह गुमसुम रहकर
सदियों का संताप सहना है
!
(जनवरी, 1989)
शंबूक का कटा सिर - ओमप्रकाश वाल्मीकि
11:44 am
गंगा सहाय मीणा
जब भी मैंने
किसी घने वृक्ष की छांव में बैठकर
घडी भर सुस्ता लेना चाहा
मेरे कानों में
भयानक चीत्कारें गूंजने लगी
जैसे हर एक टहनी पर
लटकी हो लाखों लाशें
जमीन पर पडा हो शंबूक का कटा सिर.
मैं, उठकर भागना चाहता हूं
शंबूक का सिर मेरा रास्ता रोक लेता है
चीख-चीखकर कहता है-
युगों-युगों से पेड पर लटका हूं
बार-बार राम ने मेरी हत्या की है.
मेरे शब्द पंख कटे पक्षी की तरह
तडप उठते हैं-
तुम अकेले नहीं मारे गए तपस्वी
यहां तो हर रोज मारे जाते हैं असंख्य लोग;
जिनकी सिसकियां घुटकर रह जाती है
अंधेरे की काली पर्तों में
यहां गली-गली में
राम है
शंबूक है
द्रोण है
एकलव्य है
फिर भी सब खामोश है
कहीं कुछ है
जो बंद कमरों से उठते क्रंदन को
बाहर नहीं आने देता
कर देता है
रक्त से सनी उंगलियों की महिमा मंडित.
शंबूक, तुम्हारा रक्त जमीन के अंदर
समा गया है जो किसी भी दिन
फूटकर बाहर आएगा
ज्वालामुखी बनकर!
(सितंबर 1988), 'सदियों का संताप' संकलन से.
किसी घने वृक्ष की छांव में बैठकर
घडी भर सुस्ता लेना चाहा
मेरे कानों में
भयानक चीत्कारें गूंजने लगी
जैसे हर एक टहनी पर
लटकी हो लाखों लाशें
जमीन पर पडा हो शंबूक का कटा सिर.
मैं, उठकर भागना चाहता हूं
शंबूक का सिर मेरा रास्ता रोक लेता है
चीख-चीखकर कहता है-
युगों-युगों से पेड पर लटका हूं
बार-बार राम ने मेरी हत्या की है.
मेरे शब्द पंख कटे पक्षी की तरह
तडप उठते हैं-
तुम अकेले नहीं मारे गए तपस्वी
यहां तो हर रोज मारे जाते हैं असंख्य लोग;
जिनकी सिसकियां घुटकर रह जाती है
अंधेरे की काली पर्तों में
यहां गली-गली में
राम है
शंबूक है
द्रोण है
एकलव्य है
फिर भी सब खामोश है
कहीं कुछ है
जो बंद कमरों से उठते क्रंदन को
बाहर नहीं आने देता
कर देता है
रक्त से सनी उंगलियों की महिमा मंडित.
शंबूक, तुम्हारा रक्त जमीन के अंदर
समा गया है जो किसी भी दिन
फूटकर बाहर आएगा
ज्वालामुखी बनकर!
(सितंबर 1988), 'सदियों का संताप' संकलन से.
युग चेतना - ओमप्रकाश वाल्मीकि
1:56 am
गंगा सहाय मीणा
मैंने दुःख झेले
सहे कष्ट पीढी-दर-पीढी इतने
फिर भी देख नहीं पाये तुम
मेरे उत्पीडन को
इसलिए युग समूचा
लगता है पाखंडी मुझको.
इतिहास यहां नकली है
मर्यादाएं सब झूठी
हत्यारों की रक्त रंजित उंगलियों पर
जैसे चमक रही
सोने की नग जडी अंगूठियां.
कितने सवाल खडे हैं
कितनों के दोगे तुम उत्तर
मैं शोषित, पीडित हूं
अंत नहीं मेरी पीडा का
जब तक तुम बैठे हो
काले नाग बने फन फैलाये
मेरी संपत्ति पर.
मैं खटता खेतों में
फिर भी भूखा हूं
निर्माता मैं महलों का
फिर भी निष्कासित हूं
प्रताडित हूं.
इठलाते हो बलशाली बनकर
तुम मेरी शक्ति पर
फिर भी मैं दीन-हीन जर्जन हूं
इसलिए युग समूचा
लगता है पाखंडी मुझको.
(अक्टूबर 1988), 'सदियों का संताप' संकलन से.
सहे कष्ट पीढी-दर-पीढी इतने
फिर भी देख नहीं पाये तुम
मेरे उत्पीडन को
इसलिए युग समूचा
लगता है पाखंडी मुझको.
इतिहास यहां नकली है
मर्यादाएं सब झूठी
हत्यारों की रक्त रंजित उंगलियों पर
जैसे चमक रही
सोने की नग जडी अंगूठियां.
कितने सवाल खडे हैं
कितनों के दोगे तुम उत्तर
मैं शोषित, पीडित हूं
अंत नहीं मेरी पीडा का
जब तक तुम बैठे हो
काले नाग बने फन फैलाये
मेरी संपत्ति पर.
मैं खटता खेतों में
फिर भी भूखा हूं
निर्माता मैं महलों का
फिर भी निष्कासित हूं
प्रताडित हूं.
इठलाते हो बलशाली बनकर
तुम मेरी शक्ति पर
फिर भी मैं दीन-हीन जर्जन हूं
इसलिए युग समूचा
लगता है पाखंडी मुझको.
(अक्टूबर 1988), 'सदियों का संताप' संकलन से.
कविता और फसल - ओमप्रकाश वाल्मीकि
1:10 pm
गंगा सहाय मीणा
ठंडे कमरों में बैठकर
पसीने पर लिखना कविता
ठीक वैसा ही है
जैसे राजधानी में उगाना फसल
कोरे कागजों पर.
फसल हो या कविता
पसीने की पहचान है दोनों ही.
बिना पसीने की फसल
या कविता
बेमानी है
आदमी के विरूद्ध
आदमी का षडयंत्र-
अंधे गहरे समंदर सरीखा
जिसकी तलहटी में
असंख्य हाथ
नाखूनों को तेज कर रहे हैं
पोंछ रहे हैं उंगलियों पर लगे
ताजा रक्त के धब्बे.
धब्बेः जिनका स्वर नहीं पहुंचता
वातानुकूलित कमरों तक
और न ही पहुंच पाती है
कविता ही
जो सुना सके पसीने का महाकाव्य
जिसे हरिया लिखता है
चिलचिलाती दुपहर में
धरती के सीने पर
फसल की शक्ल में.
(सितंबर, 1986)
'सदियों का संताप' संकलन से
पसीने पर लिखना कविता
ठीक वैसा ही है
जैसे राजधानी में उगाना फसल
कोरे कागजों पर.
फसल हो या कविता
पसीने की पहचान है दोनों ही.
बिना पसीने की फसल
या कविता
बेमानी है
आदमी के विरूद्ध
आदमी का षडयंत्र-
अंधे गहरे समंदर सरीखा
जिसकी तलहटी में
असंख्य हाथ
नाखूनों को तेज कर रहे हैं
पोंछ रहे हैं उंगलियों पर लगे
ताजा रक्त के धब्बे.
धब्बेः जिनका स्वर नहीं पहुंचता
वातानुकूलित कमरों तक
और न ही पहुंच पाती है
कविता ही
जो सुना सके पसीने का महाकाव्य
जिसे हरिया लिखता है
चिलचिलाती दुपहर में
धरती के सीने पर
फसल की शक्ल में.
(सितंबर, 1986)
'सदियों का संताप' संकलन से
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